92% of doctors regret not being able to save lives due to lack of resources, 20% go through severe stress, yet 57% want children to become doctors | 92% डॉक्टर्स को अफसोस- सुविधाओं की कमी के चलते कोरोना मरीजों को नहीं बचा पाए; 20% स्ट्रेस में रहे, फिर भी 57% चाहते हैं कि बच्चे डॉक्टर बनें


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जयपुर3 घंटे पहले

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दूसरी लहर के बाद भास्कर ने डॉक्टरों से उनके अनुभव पर बात की तो पता चला उन्हें मुख्य फ्रंटलाइनर्स का दर्जा ऐसे ही नहीं हासिल है। - Dainik Bhaskar

दूसरी लहर के बाद भास्कर ने डॉक्टरों से उनके अनुभव पर बात की तो पता चला उन्हें मुख्य फ्रंटलाइनर्स का दर्जा ऐसे ही नहीं हासिल है।

  • जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा, अजमेर और बीकानेर के डॉक्टर्स से सीधे सवाल

महीनों घर-परिवार से दूर रहे। 24-24 घंटे काम किया। सैकड़ों, हजारों मौतें आंखों के सामने देखीं लेकिन जुटे रहे। खुद की जान जोखिम में डालकर अनगिनत जानें बचाईं। ऐसी ही जिंदगी रही है पिछले डेढ़ साल से कोरोनों के दौरान डॉक्टर्स की। दूसरी लहर के बाद भास्कर ने डॉक्टर्स से उनके अनुभव पर बात की तो पता चला उन्हें मुख्य फ्रंटलाइनर्स का दर्जा ऐसे ही नहीं हासिल है।

कोरोना के दबाव और परिवार से दूरी ने 68% डॉक्टर्स को स्ट्रेस में ला दिया, फिर भी 60% मानते हैं कि इसके लिए उन्हें कोई खास सम्मान या पहचान की जरूरत नहीं है, बल्कि उन्होंने तो अपना काम किया है। इतना ही नहीं 57% ने तो कहा कि वे चाहते हैं कि उनके बच्चे भी डॉक्टर बनें और मरीजों की सेवा करें।

डॉक्टर्स डे के मौके पर भास्कर ने राजस्थान के प्रमुख शहरों जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा, अजमेर और बीकानेर के डॉक्टर्स से सीधे सवाल किए। पढ़िए क्या कहना है उनका…

सवाल- आपने न सिर्फ पेशे का धर्म निभाया बल्कि अपनी जान जोखिम में डालकर मरीजों की सेवा की। आपको लगता है कि समाज और सरकार ने इस प्रयास को पहचाना, सम्मानित किया?

सवाल- कोविड की सैकेंड वेव के दौरान मरीजों को अस्पतालों से कई शिकायतें थीं, ऐसे में मरीज और आपके बीच भरोसा बढ़ा या घटा?

सवाल- कोविड जैसी परेशानियों के बाद भी क्या आप चाहेंगे कि आपके बच्चे भी मेडिकल का पेशा चुनें और सेवा करें?

डॉक्टर्स डे पर बोले- हमें भगवान मत मानिए, इंसान हैं, कर्म कर रहे हैं

  • बीकानेर के एक डॉक्टर का कहना है कि भारतीय चिकित्सा सेवा जैसा एक नया कैडर बनना चाहिए। क्योंकि आईएएस को स्वास्थ्य सेवाओं की एक्सपर्टीज नहीं होती। अस्पतालों में लाल फीताशाही हटाइए। यह सभी के लिए अच्छा होगा। बुनियादी ढांचे में बदलाव की जरूरत है। स्वास्थ्य को सबसे अधिक बजट दिया जाना चाहिए।
  • जोधपुर के हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. हर्ष भाटी का कहना है कि डॉक्टर को समाज भगवान का दर्जा न दे। डॉक्टर भी इंसान है और वह अपना काम करता है। कोरोना में भी डॉक्टर्स ने वही किया जो उन्हें करना चाहिए था। समय और जरूरत के मुताबिक सभी अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह, पूरी सच्चाई से और मेहनत के साथ निभाएं तो समाज में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है।
  • बीकानेर के डॉ. गजानंद कुड़ी ने कहा कि संसाधनों के अभाव में मरीजों की जान बचाना हमारे लिए चुनौतीपूर्ण था। पता होता था कि मरीज की स्थिति नाजुक है, लेकिन बेड और ऑक्सीजन के अभाव में एडमिट नहीं कर पा रहे थे। लेकिन इसका मतलब डॉक्टर से हिंसा शुरू कर देना नहीं है। ये निंदनीय है, स्थाई हल निकलना चाहिए। डॉक्टर के प्रति सकारात्मक रहना चाहिए।

भास्कर ने ऐसे किया सर्वे
जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा, अजमेर और बीकानेर के फ्रंटलाइन डॉक्टर्स को भास्कर ने ऑनलाइन सवालों का एक फॉर्मेट भेजा और कोविड के दौरान उनके अनुभवों के आधार पर जवाब देने को कहा। इनमें कुल 507 डॉक्टर्स ने जवाब भेजे। इसमें जयपुर के 116, जोधपुर के 87, उदयपुर के 68, कोटा के 96, अजमेर के 41 और बीकानेर के 99 डॉक्टर्स शामिल थे।

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