Dr. with soft heart and funny mood was also Relief: Sardar Birch | नरम दिल और मजाकिया मिजाज वाले भी थे डाॅ. राहत: सरदार पंछी


लुधियाना14 घंटे पहले

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डॉ. राहत इंदौरी के साथ गुलजार, डा. केवल धीर और प्रो.गोपीचंद नारंग

  • साहिर लुधियानवी के शहर में 2016 में मुशायरे में शामिल हुए थे नामवर शायर डॉ.राहत इंदौरी

अपनी बेबाक, इंकलाबी-तेवरों से दुनिया में पहचान रखने नामवर शायर डॉ.राहत इंदौरी के निधन से यहां से जुड़े शायरों, साहित्यकारों और उनके प्रशंसकों को भी गहरा झटका लगा। इत्तेफाक से साहिर लुधियानवी के इस शहर में कई बार आने की वजह से उनका यहां से खासा जुड़ाव था। उनके कलाम “सफर-सफर तेरी यादों का नूर जाएगा, हमारे साथ ये सूरज जरूर जाएगा’ को याद करते मशहूर शायर सागर सियालकोटी ने सांझा किया।

उनके कहने की मंशा यही रही कि वाकई एक सूरज के तौर पर डॉ.राहत भी आखिरी सफर पर चले गए। साल 2016 में शहर में रखे मुशायरे की एक तस्वीर भी सहेज रखी, जिसमें डॉ.राहत के साथ नामवर शायर वसीम बरेलवी, सरदार पंछी और वह खुद मंच पर साथ मौजूद थे।

डॉ. इंदौरी के कलाम में समाज के अहम मुद्दों पर संजीदा सवाल भी होते थे

नातिया-कलाम के जरिए गैर-मुल्कों तक पहचान रखने वाले बुजुर्ग शायर सरदार पंछी के मुताबिक तीखे तेवरों के साथ कलाम पेश करने वाले डॉ.राहत निजी तौर पर नरम दिल और मजाकिया मिजाज वाले भी थे। उनके कलाम में जिद्दत(नयापन) होने के साथ सियासत से लेकर समाज के अहम मुद्दों पर संजीदा सवाल होते थे। उम्र में करीब 18 साल छोटे होने के बावजूद वह पहले चले गए। उनके कद से मुत्तासिर होने की वजह से मैं भी अदब से राहत भाई कहता था। मंच पर रवायती तौर पर ही नहीं, कई मौकों पर वह मेरे कलाम को लेकर अकेले में भी दाद देते थे।

राहत ऊर्दू अदब के गहरे जानकार थे : डाॅ. धीर

मशहूर लेखक व अदीब इंटरनेशनल संस्था के चेयरमैन डॉ.केवल धीर ने साल 2005 में जश्ने-साहिर मुशायरे में उनके साथ अपनी तस्वीर सांझा करते बताया कि तब डॉ.राहत, गुलजार व प्रो.गोपी चंद नारंग मंच पर एक साथ थे। एक प्रोफेसर से शायर बने राहत ऊर्दू अदब के गहरे जानकार थे। जश्ने साहिर में सत्रह बार शिरकत करना उनके शायरी, शायरों और कद्रदानों से लगाव की यादगार मिसाल है।

शायर गुलाम हसन कैसर भी याद करते हैं कि शहर के सरकारी कालेज में डॉ.राहत की मौजूदगी में उनको कलाम पढ़ने का मौका मिला था। उस वक्त स्टेज पर नामवर बाकी शायरों में डॉ.बशीर बद्र, अंजुम रहबर, खुमार बाराबंकवी भी मौजूद थे। बतौर शायर राहत बेबाक, बेलाग, बेखौफ और बेदाग थे। उन्होंने अपने कलाम पेश करने के अलग अंदाज से इस सोच को भी बदला था कि महज तरन्नुम में गाई गजल ही बेहतरीन नहीं होती है।

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