Kanwar Yatra 2021, Kanwar Yatra in ujjain, Kanwar Yatra in haridwar, facts about kanwar yatra in hindi | कोरोना की वजह से गंगोत्री, यमुनोत्री, हरिद्वार और उज्जैन की प्रसिद्ध कावड़ यात्राएं स्थगित, कावड़ में जल भरकर शिव पूजा करने की है परंपरा


2 घंटे पहले

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आज से शिव पूजा का माह सावन शुरू हो गया है। 22 अगस्त को पूर्णिमा और रक्षा बंधन पर ये महीना खत्म होगा। इस महीने में भक्त कावड़ यात्रा करते हैं। कावड़ यात्रा में शामिल कावड़िये केसरी रंग के कपड़े पहनते हैं। खासतौर पर गोमुख, गंगोत्री, इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन जैसे तीर्थ स्थानों से शिव भक्त कावड़ में गंगा जल भरते हैं और अलग-अलग शिव मंदिरों में अभिषेक करने के लिए पैदल यात्रा करते हैं।

देशभर में कई जगहों पर कावड़ यात्राएं निकाली जाती हैं, लेकिन इस बार कोरोना महामारी के चलते अधिकतर जगहों पर कावड़ यात्रा निकालने पर शासन ने प्रतिबंध लगा दिया गया है। हर साल हरिद्वार से लाखों भक्त कावड़ में गंगाजल भरकर अपने-अपने क्षेत्र के शिव मंदिर ले जाते हैं और शिवलिंग पर अर्पित करते हैं, लेकिन इस बार भक्तों से कावड़ यात्रा के लिए हरिद्वार न आने की अपील की जा रही है।

कावड़ यात्रा भी शिव पूजा करने का एक तरीका है। सावन माह में भक्त पवित्र नदियों का जल कावड़ में भरते हैं और जिस शिव मंदिर में उनकी गहरी आस्था है, वहां जाकर शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। जैसे कुछ भक्त उज्जैन की शिप्रा नदी से कावड़ में जल भरते हैं और यहां से करीब 140 किमी दूर ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग में चढ़ाते हैं। कुछ भक्त ओंकारेश्वर के पास नर्मदा नदी से जल भरते हैं और उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग पर चढ़ाते हैं।

– पं. मनीष शर्मा, ज्योतिषाचार्य, उज्जैन

हर साल सावन माह में देशभर से कावड़ यात्रा निकालने के लिए भक्त गंगोत्री पहुंचते हैं। गंगोत्री से कावड़ में जल भरकर अपने-अपने क्षेत्र के ज्योतिर्लिंग में गंगा जल चढ़ाने के लिए कावड़ यात्रा करते हैं। इस साल कोरोना महामारी की वजह से राज्य सरकार ने कावड़ यात्राएं स्थगित कर दी हैं।

– सुरेश सेमवाल, अध्यक्ष, उत्तराखंड के गंगोत्री मंदिर

यमुनोत्री धाम से हर बार हजारों भक्त देशभर से पहुंचते हैं और यमुना नदी का जल कावड़ में लेकर अपने-अपने क्षेत्र के शिवालय तक ले जाते हैं। काफी लोग पैदल यात्रा करते हैं, कुछ लोग अपने-अपने वाहनों से जल ले जाते हैं। इस बार शासन ने क्षेत्र में यात्रा पर प्रतिबंध लगा रखा है।

– कृतेश्वर उनियाल, सचिव, यमुनोत्री धाम मंदिर

बिहार के अधिकतर कावड़ यात्री देवघर के पास सुल्तानगंज में गंगा नदी से जल कावड़ में भरते हैं और झारखंड के बाबा बैजनाथ मंदिर में शिव जी का अभिषेक करने के लिए पैदल यात्रा करते हैं। सुल्तानगंज से बैजनाथ धाम की दूरी करीब 110 किमी है। इस बार कोरोना की वजह से यहां भी कावड़ यात्रा स्थगित कर दी गई है।

– गोकुल दुबे, गया, बिहार

कावड़ यात्रा जुड़े फैक्ट्स

मान्यता है कि देवशयनी एकादशी के बाद सभी देवता शयन करते हैं, लेकिन सावन माह में शिव जी अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाते हैं। इस माह में कावड़ यात्रा निकालने का विशेष महत्व है। कावड़ यात्रा से भक्त के मन में संकल्प शक्ति और आत्मविश्वास बढ़ता है।

कावड़ यात्री के लिए नशा वर्जित रहता है। मांस-मदिरा का सेवन भी नहीं किया जाता है।

स्नान किए बिना कावड़ यात्री कावड़ को छूते नहीं हैं। यात्रा करते समय तेल, साबुन, कंघी और अन्य श्रृंगार सामग्री का उपयोग भी कावड़ यात्री नहीं करते हैं।

कावड़ यात्री के लिए पलंग पर सोना-बैठना मना रहता है। चमड़े से बनी वस्तु का स्पर्श एवं रास्ते में किसी वृक्ष या पौधे के नीचे कावड़ नहीं रखी जा सकती है।

कावड़ यात्रा से जुड़ी मान्यताएं

मान्यता है कि सबसे पहली कावड़ यात्रा श्रवण कुमार ने की थी। श्रवण ने अपने माता-पिता को कावड़ में बैठाकर तीर्थ दर्शन करवाए थे। एक अन्य मान्यता के अनुसार पूरी पृथ्वी जीतने के बाद परशुराम ने मयराष्ट्र (आज का मेरठ) से होकर निकले तो उन्होंने पुरा नाम की जगह पर आराम किया था। उस जगह पर उनकी शिव मंदिर बनाने की इच्छा हुई। शिवलिंग के लिए परशुराम पत्थर लाने हरिद्वार गंगा तट पर पहुंचे। उन्होंने मां गंगा की आराधना की। परशुराम की प्रार्थना सुनकर पत्थर रोने लगे।

सभी पत्थर देवी गंगा से अलग नहीं होना चाहते थे। भगवान परशुराम ने उनसे कहा कि जो पत्थर वह ले जाएंगे, उसका युगों-युगों तक गंगा जल से अभिषेक किया जाएगा। इसके बाद परशुराम हरिद्वार के गंगातट से पत्थर लेकर आ गए। उस पत्थर को शिवलिंग के रूप में पुरेश्वर महादेव मंदिर में स्थापित किया। जब से परशुराम ने हरिद्वार के पत्थर को शिवलिंग बनाकर पुरेश्वर महादेव मंदिर में स्थापित किया है, तब से कावड़ यात्रा की शुरूआत हुई है।

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